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Explainer: क्या चीन से जीतकर लौटे ट्रंप या जिनपिंग ने खेल पलट दिया? जानें, किसके हाथ लगी बाजी

 Written By: Vineet Kumar Singh @VickyOnX
 Published : May 16, 2026 07:37 am IST,  Updated : May 16, 2026 07:38 am IST

Trump Xi Meeting: डोनाल्ड ट्रंप ने चीन की यात्रा को लेकर कई बड़े दावे किए हैं, लेकिन वास्तविकता में अभी तक कुछ भी ठोस सामने नहीं आया है। दूसरी तरफ, चीन को ट्रंप की यात्रा से एक फायदा जरूर हुआ कि उसने अमेरिका के बराबर महाशक्ति के रूप में अपनी छवि स्थापित करने की दिशा में बड़ा कदम बढ़ा दिया।

अमेरिका के राष्ट्रपति...- India TV Hindi
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग। Image Source : AP

Trump Xi Meeting: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपनी चीन यात्रा खत्म करके लौट चुके हैं और लौटते ही उन्होंने इसे 'ऐतिहासिक' करार दिया। ट्रंप ने दावा किया कि चीन ने अमेरिकी विमान निर्माता बोइंग से 200 विमान खरीदने पर सहमति जताई है। उन्होंने यह भी कहा कि भविष्य में चीन 750 और विमान खरीद सकता है। ट्रंप के मुताबिक यह समझौता अमेरिकी उद्योग, नौकरियों और खासतौर पर अमेरिकी कृषि क्षेत्र के लिए बड़ी राहत लेकर आएगा। उन्होंने यहां तक कहा कि इस सौदे से जीई ऐरोस्पेस को भी बड़ा फायदा होगा क्योंकि चीन को सैकड़ों विमान इंजन सप्लाई किए जा सकते हैं।

कूटनीति में ट्रंप पर भारी पड़ गए जिनपिंग?

चीन यात्रा से लौटते समय ट्रंप ने अपनी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात को 'G-2' की मीटिंग बताया। उनका कहना था कि यह दुनिया की 2 सबसे बड़ी ताकतों के नेताओं की मुलाकात थी और इतिहास में इसे बहुत महत्वपूर्ण माना जाएगा। ट्रंप का यह बयान इसलिए बेहद अहम माना जा रहा है क्योंकि चीन लंबे समय से चाहता रहा है कि दुनिया उसे अमेरिका के बराबर महाशक्ति के रूप में स्वीकार करे। अमेरिकी अखबार 'वॉशिंगटन पोस्ट' ने भी लिखा कि इस यात्रा में चीन ने पूरी सावधानी से ऐसा माहौल बनाया जिसमें जिनपिंग और ट्रंप बराबरी के नेता के रूप में दिखाई दें। यह वही रणनीतिक तस्वीर थी जिसे चीन वर्षों से दुनिया के सामने स्थापित करना चाहता था।

बोइंग के लिए यह समझौता बेहद महत्वपूर्ण

दरअसल, बोइंग के लिए यह समझौता बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। एक समय ऐसा था जब बोइंग के नैरोबॉडी विमानों का लगभग एक-तिहाई हिस्सा चीन को जाता था। लेकिन बाद में अमेरिका-चीन तनाव, कोविड महामारी और सबसे बढ़कर 737 मैक्स विमानों के हादसों ने कंपनी की स्थिति खराब कर दी। 2019 में इंडोनेशिया और इथियोपिया में दो अलग-अलग दुर्घटनाओं में कुल 346 लोगों की मौत हो गई थी। इसके बाद चीन दुनिया का पहला देश बना जिसने 737 मैक्स विमानों की उड़ान पर रोक लगा दी। हालांकि जनवरी 2023 में चीन ने इन विमानों को दोबारा उड़ान की अनुमति दे दी, लेकिन तब तक बोइंग का चीनी बाजार लगभग ठप पड़ चुका था।

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Image Source : APबोइंग के लिए चीन का सौदा बेहद फायदे वाला साबित हो सकता है।

लगातार मुश्किलों में फंसी रही थी बोइंग

चीनी बाजार के ठप पड़ने के बाद बोइंग लगातार मुश्किलों में फंसी रही। 2024 में एक 737 मैक्स विमान में उड़ान के दौरान 'डोर प्लग' निकल जाने की घटना ने कंपनी की सुरक्षा और गुणवत्ता व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। इसी दौर में केली ऑर्टबर्ग ने कंपनी की कमान संभाली। ऑर्टबर्ग पहले ही कह चुके थे कि ट्रंप की चीन यात्रा बोइंग के लिए बड़ा अवसर साबित हो सकती है। उनका मानना था कि ट्रंप विदेशी दौरों के दौरान अमेरिकी कंपनियों के लिए बड़े व्यापारिक समझौते कराने में सफल रहे हैं। बता दें कि पिछले कुछ समय में ट्रंप की विदेश यात्राओं के दौरान विमान सौदे लगातार चर्चा में रहे हैं।

ट्रंप के चलते बदल गई बोइंग की किस्मत

मध्य पूर्व यात्रा के दौरान कतर एयरवेज ने 210 तक बोइंग विमानों का ऑर्डर दिया था, जिसे कंपनी ने अपना सबसे बड़ा वाइडबॉडी विमान समझौता बताया। सऊदी अरब ने भी अमेरिकी विमानों में रुचि दिखाई थी। दक्षिण कोरिया की कोरियन एयर ने 100 से अधिक विमान, इंजन और मेंटेनेंस सेवाओं के लिए लगभग 50 अरब डॉलर का समझौता किया। वहीं तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोआन की अमेरिका यात्रा के बाद टर्किश एयरलाइंस ने 225 बोइंग विमान खरीदने की योजना की घोषणा की। दुबई एयर शो में एमिराट्स ने 65 बोइंग 777-9 विमानों का ऑर्डर दिया, जबकि फ्लाइदुबई ने 75 बोइंग 737 मैक्स खरीदने का फैसला किया।

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Image Source : APशी जिनपिंग ने कूटनीति में ट्रंप पर बढ़त हासिल की है।

ताइवान के मुद्दे पर भी ट्रंप ने दिया बयान

चीन की यात्रा के दौरान ट्रंप ने ताइवान मुद्दे पर भी महत्वपूर्ण बयान दिया। उन्होंने कहा कि चीन ताइवान को स्वतंत्र देश के रूप में नहीं देखना चाहता, लेकिन जब तक वह राष्ट्रपति हैं, तब तक उन्हें नहीं लगता कि चीन कोई आक्रामक कदम उठाएगा। ट्रंप ने यह भी कहा कि वे चाहते हैं कि चीन 'शांत रहे' और युद्ध जैसी स्थिति पैदा न हो। यह बयान इसलिए अहम है क्योंकि ताइवान को लेकर अमेरिका और चीन के बीच लंबे समय से तनाव बना हुआ है और इस मुद्दे को एशिया की सबसे बड़ी भू-राजनीतिक चुनौती माना जाता है।

ट्रंप के दावों पर आखिर क्यों उठ रहे सवाल?

हालांकि इस पूरी यात्रा के बाद सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि क्या अमेरिका को वास्तव में कोई बड़ी आर्थिक जीत मिली है या ट्रंप सिर्फ बड़े-बड़े दावे कर रहे हैं। फिलहाल चीन की तरफ से इन समझौतों की बहुत ज्यादा विस्तृत जानकारी सामने नहीं आई है। बोइंग ने 200 विमानों के ऑर्डर की पुष्टि तो की, लेकिन यह नहीं बताया कि कौन-कौन से मॉडल खरीदे जाएंगे, उनकी कीमत क्या होगी और डिलीवरी कब शुरू होगी। कृषि, LNG, बीफ और अन्य अमेरिकी उत्पादों को लेकर भी कोई स्पष्ट और विस्तृत व्यापारिक दस्तावेज सार्वजनिक नहीं हुआ है।

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Image Source : APबैठक के दौरान ट्रंप पर शी पूरी तरह भारी दिखाई दिए।

छवि मजबूत करने के लिए बड़े बयान दे रहे ट्रंप?

जर्मन मार्शल फंड की विशेषज्ञ बोनी ग्लेसर ने भी कहा कि अभी दुनिया के पास वही जानकारी है जो ट्रंप ने खुद सार्वजनिक रूप से बताई है। यानी असली समझौतों की गहराई और उनका आर्थिक असर अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। यही वजह है कि कई विश्लेषक ट्रंप के दावों को राजनीतिक प्रचार के नजरिए से भी देख रहे हैं। ट्रंप हमेशा से बड़े और आक्रामक दावे करने वाले नेता रहे हैं और इस यात्रा में भी उन्होंने 'ऐतिहासिक' और 'G-2' जैसे शब्दों का इस्तेमाल करके अपनी राजनीतिक छवि मजबूत करने की कोशिश की।

बोइंग के लिए चीन का बाजार खुलना बड़ी कामयाबी

फिर भी यह कहना गलत होगा कि अमेरिका को कोई फायदा नहीं हुआ। बोइंग के लिए चीन का बाजार दोबारा खुलना अपने आप में बहुत बड़ी बात है। इससे अमेरिकी विमान उद्योग को राहत मिल सकती है और ट्रंप घरेलू राजनीति में इसे अपनी आर्थिक सफलता के रूप में पेश कर सकते हैं। लेकिन यह भी सच है कि अभी बहुत कुछ कागजों और घोषणाओं तक सीमित दिखाई देता है। अगर ये समझौते पूरी तरह लागू नहीं होते तो ट्रंप के बड़े दावे सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी बनकर रह जाएंगे।

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Image Source : APएक्सपर्ट्स का मानना है कि ट्रंप की बयानबाजी हकीकत से थोड़ी ज्यादा है।

कई मामलों में शी जिनपिंग ज्यादा मजबूत स्थिति में

अगर इस यात्रा को कूटनीतिक नजरिए से देखा जाए तो कई मामलों में शी जिनपिंग ज्यादा मजबूत स्थिति में दिखाई देते हैं। सबसे बड़ी बात यह रही कि चीन खुद को अमेरिका के बराबर वैश्विक शक्ति के रूप में प्रस्तुत करने में सफल रहा। ट्रंप का 'G-2' बयान भी चीन के लिए प्रतीकात्मक जीत माना जा रहा है। पूरी यात्रा के दौरान चीन ने माहौल, संदेश और छवि, तीनों को बहुत नियंत्रित तरीके से पेश किया। ताइवान जैसे मुद्दे पर भी ट्रंप का अपेक्षाकृत नरम रुख चीन के लिए सकारात्मक संकेत माना जा रहा है।

अमेरिका के मुकाबले चीन की छवि को ज्यादा फायदा

कुल मिलाकर देखें तो ट्रंप की यह यात्रा पूरी तरह असफल भी नहीं रही और पूरी तरह ऐतिहासिक जीत भी नहीं कही जा सकती। आर्थिक स्तर पर अमेरिका को संभावित फायदे की उम्मीद जरूर मिली है, खासकर बोइंग जैसे उद्योगों को। लेकिन कूटनीतिक और वैश्विक छवि के स्तर पर चीन ने इस यात्रा का इस्तेमाल अपने प्रभाव को मजबूत करने के लिए ज्यादा प्रभावी ढंग से किया। इसलिए फिलहाल यही कहा जा सकता है कि ट्रंप अपने समर्थकों के सामने इसे बड़ी जीत की तरह पेश कर रहे हैं, जबकि वास्तविक तस्वीर अभी भी पूरी तरह साफ नहीं है।

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